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यज्ञ से लाभ ,यज्ञ द्वारा रोगों का उपचार




यज्ञ से लाभ , क्या यज्ञ द्वारा रोगों का उपचार होता हैं ? क्या यज्ञ हवन से आप अपनी समस्याओं या रोगों  को दूर कर सकते हैं ??


जबाब हैं -- हाँ बेशक.



 बच्चों के बुख़ार होने पर हवन सामग्री को आगे बताया गया है।
हिन्दू धर्म मे वैदिक काल से ही यज्ञ से लाभ और यज्ञ करने की परम्परा रही हैं। यज्ञ कोई कर्मकांड ही नही हैं बल्कि एक ऐसा उपाय हैं जिससे बहुत सी समस्याओं का समाधान किया जा सकता हैं। 

वक्त के साथ - साथ हमारी वैदिक सभ्यता को कई कारणों से नीचा दिखाया गया हैं या फिर लुफ्त कर दिया गया हैं कई आक्रमणकारियों ने वैदिक ज्ञान की पुस्तकों को जला दिया उनके ज्ञान को देने वाले आचार्यो की हत्याएं करा दी गई । ये ज्ञान पूरी तरह से लुफ्त ना हो इस लिए मानव को बहुत प्रयास करने पड़ेगे।
क्योकि हर कार्य का आरम्भ यज्ञ हवन से ही किया जाता है , मै आपको यज्ञ के लाभ बारे में कुछ बताऊँगा इसका विस्तार से वर्णन किसी ओर दिन करूँगा आइये जान लेते है यज्ञों के विविध प्रकार :-  

श्रुति में वैदिक कर्मों के पांच विभाग बतलाये गये हैं- -

1. अग्निहोत्र
2. दर्श-पूर्णमास, 
3. चातुर्मास 
4. पशु, 
5. सोम

स्मृति में यज्ञों का विभाग निम्न प्रकार से किया है-  
1. पाकयज्ञ संस्था, 
2. हविसंस्थार्यज्ञ , 
3. सोम संस्था। 

पाक यज्ञ सस्था में- 
1. औपासन होम, 
2. वैश्वदेव,
3. पार्वण 
4. अष्टका, 
5. मासिश्राद्ध, 
6 श्रावणा, 
7. शूलयण, 

हवि संस्थार्यज्ञ में
4. चातुर्मास,
5. निरूढ पशु बन्ध, 
6. सौत्रायणि और 
7. पिण्डपितृयज्ञ 

सोम संस्था में 
1. अग्निष्टोम,
2. अत्यग्निष्टोम 
3. उक्थ्य, 
4. शोडशी, 
5. वाजपेय, 
6. आतिरात्र और 
7. अप्तोर्याम 

इस तरह ‘‘गौतम धर्मसूत्र‘‘ में श्रौतस्मार्त कर्मों की संख्या मिलाकर 21 यज्ञ बतलाये हैं। इनमें पाकयज्ञ संख्याओं का निरूपण गृह्यसूत्रों एवं ब्राह्मणात्मक देवभाग में किया गया है।

इस तरह श्रौत-स्मार्त यज्ञों में से कुछ का नाम निर्देशमात्र ऊपर किया गया है। इसका संक्षिप्त विवरण लिखने में एक वृहत् ग्रन्थ लिखना पड़ जायेगा। इन यज्ञों के अतिरिक्त बहुत से पौराणिक, तांत्रिक एवं आगमोक्त यज्ञ हैं, 

जैसे कि--

विष्णुयाग, रुद्रयाग, महारुद्र, अतिरुद्र, गणेशयाग, चण्डयाग, गायत्री-याग, सूर्ययाग, विनायकशांति, ग्रहशांति, अद्भुतशांति, महाशांति, ऐन्द्रीशांति, लक्षहोम, कोटिहोम, वैष्णवेष्टि, वैभवीष्टि, पाद्यी, ईष्टि, नारायणी, वारूदेवी, गारूढी, वैवूही, पावमानी, आनन्ती, वैश्वक्सेनी, सौदर्शनी, पवित्रष्टि, आदि अनेक यज्ञों का विधान पाया जाता है।

प्रत्येक गृहस्थ के लिए परमावश्यक नित्य कर्तव्य उन पांच महायज्ञों में से एक भी आज विरल आचरण देखने में आता है, जिनके न करने में दोष बतलाया गया है। ये पांच महायज्ञ हैं- ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ और मनुष्य यज्ञ इन्हीं के आहुत, हुत, प्रहुत, ब्रह्महुत और प्राशित नाम बतलाये गये हैं।

गायत्री माता----
कर्मों के प्रायश्चित स्वरूप, अनिष्ट और दुर्योगों की शांति के लिए, किसी अभाव की पूर्ति के लिए, कोई सुयोग या सौभाग्य प्राप्त करने के लिए, रोग को दूर करने के लिए, देवताओं को प्रसन्न करन के लिए, धन-धान्य की अधिक उपज आदि के लिए यज्ञ से लाभ लिया जाता ह, हवन किए जाते हैं। साधनाओं में भी हवन अनिवार्य है। जितने भी जप, पाठ किए जाते हैं, उनमें किसी न किसी रूप में हवन अवश्य करना पड़ता है। गायत्री उपासना में भी हवन आवश्यक है। गायत्री को माता और यज्ञ को पिता कहा गया है। इन्हीं के संयोग से मनुष्य का आध्यात्मिक जन्म होता है। 


वेदो में यज्ञ करने का तरीका बताया गया हैं यज्ञ से लाभ केसे लिया जाता ह , यज्ञ कैसे किया जाता हैं ये मैं आपको इस लेख में नही बताऊँगा बल्कि यज्ञ करने का क्या महत्व होता हैं उसके बारे में आप से ज़िक्र करूँगा क्योकि मानव का  स्वभाव हैं पहले वो लाभ देखता हैं तभी उस कार्यो को करने का प्रयास करता हैं।

यज्ञ के धुएं से मनुष्य ही नही सभी जीव ,पेड़ पौधों को लाभ होता है

आइये जान लेते हैं यज्ञ के द्वारा कैसे कई रोगो का यज्ञ द्वारा उपचार किया जा सकता है।

किसी रोग विशेष की चिकित्सा के लिए हवन करना हो तो उसमें उस रोग को दूर करने वाली ऐसी औषधियाँ सामग्री में और मिला लेनी चाहिए जो हवन करने पर खाँसी न उत्पन्न करती हों। यह मिश्रण इस प्रकार हो सकता है—






(1) साधारण बखारो में तुलसी की लकड़ी, तुलसी के बीज, चिरायता, करंजे की गिरी 

(2) विषम ज्वरों में—पाढ़ की जड़, नागरमोथा, लाल चन्दन, नीम की गुठली, अपामार्ग,

(3) जीर्ण ज्वरों में-केशर, काक सिंगी, नेत्रवाला, त्रायमाण, खिरेंटी, कूट, पोहकर मूल

(4) चेचक में—वंशलोचन, धमासा, धनिया, श्योनाक, चौलाई की जड़ 

(5) खाँसी में —मुलहठी, अड़ूसा, काकड़ा सिंगी, इलायची, बहेड़ा, उन्नाव, कुलंजन 

(6) जुकाम में—अनार के बीज, दूब की जड़, गुलाब के फूल, पोस्त, गुलबनफसा

(7) श्वाँस में—धाय के फूल, पोन्त के डौड़े, बबूल का वक्कल, मालकाँगनी, बड़ी इलायची, 

(8) प्रमेह में—ताल मखाना, मूसली, गोखरु बड़ा, शतावरि, सालममिश्री, लजवंती के बीज 

(9) प्रदर में—अशोक की छाल, कमल केशर मोचरस, सुपाड़ी, माजूफल 

(10) बात व्याधियों में—सहजन की छाल, रास्ना, पुनर्नवा, धमासा, असगंध, बिदारीकंद, मैंथी, 

(11) रक्त विकार में—मजीठ, हरड़, बावची, सरफोंका, जबासा, उसवा

(12) हैजा में—धनियाँ, कासनी, सोंफ, कपूर, चित्रक (13) अनिद्रा में—काकजघा पीपला-मूल, भारंगी (14) उदर रोगों में—चव्य, चित्रक तालीस पत्र, दालचीनी, जीरा, आलू बुखारा, पीपरिं,

(15) दस्तों में—अतीस, बेलगिरी, ईसबगोल, मोचरस, मौलश्री की छाल, ताल मखाना, छुहारा। 

(16) पेचिश में—मरोड़फली, अनारदाना, पोदीना, आम की गुठली, कतीरा 

(17) मस्तिष्क संबंधी रोगों में-गोरख मुँडी, शंखपुष्पी, ब्राह्मी, बच शतावरी 

(18) दाँत के रोगों में—शीतल चीनी, अकरकरा, बबूल की छाल, इलायची, चमेली की जड़ 

(19) नेत्र रोगों में-कपूर, लौंग, लाल चन्दन, रसोत, हल्दी, लोध 

(20) घावों में—पद्माख, दूब की जड़, बड़ की जटाएं, तुलसी की जड़, तिल, नीम की गुठली, आँवा हल्दी। 

(21) बंध्यत्व में-शिवलिंग के बीज, जटामासी, कूट, शिलाजीत, नागरमोथा, पीपल वृक्ष के पके फल, गूलर के पके फल, बड़ वृक्ष के पके फल, भट कटाई। इसी प्रकार अन्य रोगों के लिए उन रोगों की निवारक औषधियाँ मिलाकर हवन सामग्री तैयार कर लेनी चाहिये।


बच्चे के बुखार का योग द्वारा उपचार :-


गूगल,बच, कूट, मैनसिल, शिलाजीत ,आमी हल्दी, नीम के पत्ते और शहद सबको बराबर मात्रा में कूट कर घी में डालकर हवन सामग्री बना ले बुखार होने पर 
दैहिक दैविक भौतिक तापा ।राम राज काहू नहीं व्यापा ।।
मंत्र को 108 बार जप  द्वारा अग्नि में डाल दे तो बुख़ार तुरंत ही ठीक हो जाता है।  बच्चा निरोगी होता है ।बच्चे के पास धूप को कितना देर रखना है यह अपने विवेक से देखना चाहिए।

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