पुनर्जन्म का सच
अमेरिका का दो वर्षीय बालक जेम्स सिदिम छह विदेशी भाषायें धड़ल्ले से बोल सकता था । इंग्लैंड के एक श्रमिक पुत्र जार्ज को चार वर्ष की आयु में कठिनतम गणित का प्रश्न हल करने में दो मिनट लगते थे । ऐसे बहुत से उदहारण भरे पड़े है इस संसार मे ,लेकिन कुछ लोग पुनर्जन्म का सच नहीं मानते.
मनुष्य को एक चलता - फिरता पौधा भर मानते हैं , शरीर के साथ चेतना का उद्भव और मरण के साथ ही उसका अंत मानते हैं वे इन असमय उदय हुई प्रतिभाओं की विलक्षणता का कोई समाधान नहीं ढूँढ पायेंगे ।
वृक्ष - वनस्पति , पशु - पक्षी सभी अपने प्रगति क्रम से बढ़ते हैं , उनकी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विशेषताएँ समयानुसार उत्पन्न होती हैं । फिर मनुष्य के असमय ही इतनी प्रतिभा संपन्न होने का और कोई कारण नहीं हो सकता कि उसने पूर्व जन्म में इन विशेषताओं का संचय किया हो और वे इस जन्म में जीव चेतना के साथ ही जुड़ी चली आई हों ।
( यह अंश, युगांतर चेतना प्रकाशन शांतिकुंज , हरिद्वार से लिये गए हैं चेतना प्रकासन का आभारी हूँ )
वैज्ञानिक कसौटियों पर कसे गये घटनाक्रम एवं अनुभवों द्वारा आत्मा और शरीर की भिन्नता के अधिकाधिक प्रमाण मिलते जा रहे हैं ।
शरीर के मरने पर भी आत्मा का अस्तित्व बना रहता है और जीव बिना शरीर के होने पर भी दूसरों के सम्मुख अपनी उपस्थिति प्रकट कर सकता है ,
इस तथ्य की पुष्टि में इतने ठोस प्रमाण विद्यमान है कि उन्हें झुठलाया नहीं जा सकता ।
विज्ञान के क्षेत्र की यह मान्यता अब निरस्त हो चली है कि शरीर ही मन है और उन दोनों का अंत एक साथ हो जाता है ।
मरने के बाद प्राणी की चेतना का क्या हश्र होता है , इसका निष्कर्ष निकालने के लिए अमेरिकी विज्ञानवेत्ताओं ने एक विशेष प्रकार का चेंबर बनाया ।
भीतरी हवा पूरी तरह निकाल दी गई और एक रासायनिक कुहरा इस प्रकार का पैदा कर दिया गया .
जिससे अंदर के अणुओ की हलचलों का फोटो विशेष रूप से बनाये गये कैमरे से लिये जा सके । इस चेंबर में एक छोटी पेटी में चूहा रखा गया जीसे बिजली से मारा गया ।
मरते ही उपरोक्त चेंबर में जो फोटो लिये गये , उसमें अंतरिक्ष में उड़ते हुए आणविक चूहे की तस्वीर आई । इसी प्रयोग शृंखला में दूसरे मेंढक , केकड़ा जैसे जीव मारे गये तो मरणोपरान्त उसी आकृति के अणु बादल में उड़ते देखे गये । यह सूक्ष्म शरीर हर प्राणधारी का होता है और मरने के उपरांत भी वायुभूत होकर बना रहता है ।
अन्वेषणों से अब यह तथ्य अधिकाधिक स्पष्ट होता चला जा रहा है कि शरीर की सत्ता तक ही मानवी - सत्ता सीमित नहीं ।
वह उससे अधिक और अतिरिक्त है तथा मरने के उपरांत भी आत्मा का अस्तित्व किसी न किसी रूप में बना रहता है । यह अस्तित्व किस रूप में रहता है - अभी उसका स्वरूप वैज्ञानिकों के बीच निर्धारण किया जाना शेष है ।
इलेक्ट्रोनिक एवं मैगनेटिक सत्ता के रूप में अभी वैज्ञानिक उसका अस्तित्व मानते हैं और ऐसी प्रकाश ज्योति बताते है , जो आँखों से नहीं देखी जा सकती ।
डॉ० रह्येन ने इस संदर्भ में जो शोध कार्य किया है , उससे आत्मा के अस्तित्व की इसी रूप में सिद्धि होती है । उन्होंने ऐसी दर्जनों घटनाओं का उल्लेख किया है , जिसमें किन्हीं अदृश्य आत्माओं द्वारा जीवित मनुष्यों को ऐसे परामर्श , निर्देश एवं सहयोग दिये गये - जो सच निकले और उनके लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए ।
सर विलियम वेनेट की डैयबैंड विजन्स ' पुस्तक में ऐसी देरों घटनाओं का वर्णन है जिसमें मृत्युकाल की पूर्व सूचना से लेकर घातक खतरों से सावधान रहने की पूर्व सूचनाएँ समय से पहले मिली थी और वे यथा समय सही होकर रहीं । इसी प्रकार के अपने निष्कर्षों का विवरण प्रो० रिचेट ने भी प्रकाशित कराया है
आत्मा की चैतन्य -
सत्ता के प्रतिपादन के साथ ही यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि मृत्यु के उपरांत आत्मा की गति क्या , कैसी और कहाँ होती है ?
यही बात कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् में इस प्रकार कही है ।
महर्षि उद्दालक ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को महर्षि चित्र का यज्ञ संपन्न कराने को भेजा । चित्र स्वयं महान विद्वान थे , उन्होंने श्वेतकेतु से जीवात्मा की गति संबंधी कुछ प्रश्न किये , किंतु श्वेतकेतु से उन प्रश्नों का उत्तर न बन पड़ा । उन्होंने कहा -
" हमारे पिताजी अध्यात्म विद्या के पंडित हैं , उनसे पूछकर उत्तर दूंगा । " श्वेतकेतु पिता उद्दालक के पास आये । सारी बात कह सुनाई ।
महर्षि चित्र ने जो प्रश्न किये थे . वे भी सुनाये किंतु उद्दालक स्वयं भी उन बातों को नहीं जानते थे , इसलिये उन्होंने श्वेतकेतु से कहा - तुम स्वयं चित्र के पास जाकर इन प्रश्नों का समाधान करो । प्रतिष्ठा का अभिमान नहीं करना चाहिए । विद्या या ज्ञान छोटे बालक से भी सीखना चाहिए । " श्वेतकेतु को अपने पिता की बात बहुत अच्छी लगी । वे चित्र के पास निरहंकार भाव से गये और विनीत भाव से पूछा - महर्षि हमारे पिताजी भी उन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सकते । उन्होंने आपसे ही वह विद्या जानने को भेजा है " तब चित्र ने विनीत श्रद्धा से प्रसन्न होकर जीवात्मा की परलोक गति का विस्तृत अध्ययन कराया ।
कोषीतकि ब्राह्मणोपनिषद में महर्षि चित्र ने जीव की गति और लोकोसर जीवन की व्याख्या करते हुए लिखा है
" तनेत देवयजनं पन्चानमासाद्याग्नि लोक भारच्छति । स पायुलोकं स वरुणलोकं स आदित्वलोकं स इन्दलोकं स प्रजापति लोकं स ब्रह्मलोकम् तं ब्रह्मा हाभिधावत् मम यसमा विरजों पालयनदीपाप न वाऽयजिगीय नीति कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् ।
अर्थात – जो परमेश्वर की उपासना करता है , वह देवयान मार्ग द्वारा प्रथम अग्निलोक को प्राप्त होता है । फिर वायु - लोक में पहुँचता है , वहाँ से सूर्यलोक में गमन करता , फिर वरुण - लोक में जाकर इंद्र - लोक में पहुंचता है ।
इंद्र सेक से प्रजापति - लोक , प्रजापति - लोक से ब्रह्म - लोक को प्राप्त होता है । इस ब्रह्म - लोक में प्रविष्ट होने वाले मार्ग पर ' आर ' नामक एक वृहद् जलाशय है । उससे पार होने पर काम - क्रोध आदि की उत्पति द्वारा बहा - लोक प्राप्ति की साधना और यज्ञादि पुण्य कर्मों को नष्ट करने वाले ' येष्टिह ' नामक मुहूर्ताभिमानी देवता निवास करते हैं , उनसे छुटकारा मिलने पर विरजा नाम की नदी मिलती है , जिसके दर्शन मात्र से वृद्धावस्था नष्ट हो जाती है । इससे आगे इला नाम की पृथिवी का स्वरूप इत्य नामक वृक्ष है , उससे आगे एक नगर है , जिसमें अनेकों देवता निवास करते हैं ।
उसमें बाग - बगीचे . नदी - सरोवर , बावडी , कुएँ आदि सब कुछ हैं । इन आख्यानों को आज का प्रबुद्ध समाज मानने को तैयार नहीं होता । उन्हें काल्पनिक होने की बात कही जाती है ।
संभव है उपरोक्त कथन में जो नाम प्रयुक्त हए हों , वे काल्पनिक हों , पर आज का विज्ञान यह तो स्पष्ट मानने को तैयार हो गया कि पृथ्वी के अन्यत्र लोक भी हैं , वहाँ भी नदियाँ , पर्वत , खार - खड्डे , प्रकाश , जल , वायु , ऊष्मा आदि हैं । पुनर्जन्म की घटनाओं को देख कर जो हमारे पास ही होती हैं। पुनर्जन्म को अनदेखा नही किया जा सकता हैं।


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